🔹नेताओं द्वारा दलितों के शुभचिंतक होने के दावे कितने खोखले..!

🔸यहां अपराधी या पीड़ित की जाति,धर्म और हैसियत के चश्मे से देखा जाता..!

✒️संजय वर्मा-गोरखपूर,चौरा चौरी(प्रतिनिधी)मो:-9235885830

गोरखपूर(दि.12ऑक्टोबर):-उक्त बातें मुंडेरा बाजार चौरी चौरा सृष्टि रोड वार्ड नंबर 6 अपने आवास पर कांग्रेस नगर अध्यक्ष संजू वर्मा ने कही Iयह देश की विडंबना ही है कि यहां अपराध को उसकी निकृष्टता से नहीं, बल्कि अपराधी या पीड़ित की जाति, उसके धर्म और हैसियत के चश्मे से देखा जाता है।

पिछले दिनों जब उत्तर प्रदेश में बिकरू कांड के मुख्य आरोपी विकास दुबे की मुठभेड़ में मौत के बाद कुछ राजनीतिक दलों ने प्रदेश में ब्राह्मणों की सुरक्षा पर सवाल खड़े कर अपनी राजनीति चमकाने का प्रयास किया था। क्या विकास दुबे जैसे कुख्यात आरोपी को जाति-धर्म से जोड़ना सही था?ऐसा ही अब हाथरस प्रकरण में देखने को मिल रहा है, जहां पीड़ित परिवार को बार-बार दलित बोल कर उन्हें कमजोर दिखाकर सत्ताधारी सरकार पर निशाना साधा जा रहा है।

निश्चित ही हाथरस में जो हुआ, उसकी भर्त्सना की जानी चाहिए और प्रदेश सरकार पर पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने का दबाव डालना चाहिए।लेकिन हाथरस को तो बड़े-बड़े नेताओं ने ऐसा दांव मान लिया है जो उन्हें दलित हितैषी होने का तमगा दिला सकता है। यदि नेताओं को दलितों की इतनी ही फिक्र है तो ये नेता दलित उत्पीड़न रोकने के लिए जमीनी स्तर पर काम क्यों नहीं करते? आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और हरियाणा में सबसे ज्यादा दलित उत्पीड़न के मामले सामने आते हैं और इन राज्यों में देश की दो राष्ट्रीय पार्टियां सत्ता पर काबिज हैं।

ऐसे में राजनेताओं द्वारा दलितों के शुभचिंतक होने के दावे खोखले ही नजर आते हैं।देश की वर्तमान राजनीति से नैतिकता, सामाजिक एकता, स्वस्थ प्रतिस्पर्धा, राष्ट्रहित जैसे गुण तो अब गायब हो चुके हैं और इसका स्थान संकीर्ण मानसिकता और अवसरवादी राजनीति ने ले लिया है।

नेताओं ने राजनीति को स्वार्थपूर्ति का साधन समझ लिया है और इसके लिए वे देशहित को भी दांव पर लगा सकते हैं। इस तरह की राजनीति से लोग विभिन्न वर्गों, संप्रदायों में बंट कर एक दूसरे से दूर होते जा रहे हैं और देश की एकता का यह पतन देश को एक बड़े संकट की ओर धकेल सकता है।

राष्ट्रीय, सामाजिक 

©️ALL RIGHT RESERVED