क्यों एक स्त्री को कमजोर या निर्बल होने का एहसास करवाया जाता है ?

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🔸बेटियों को जितनी हिदायत दी जाती है,उतनी बेटों को दी जाए,तो समस्या ही पैदा न हो..!

✒️संजय वर्मा-गोरखपूर,चौरा चौरी(प्रतिनिधी)मो:-9235885830

गोरखपूर(दि.20नवंबर):-उक्त बातें चौरी चौरा मुंडेरा बाजार कांग्रेस नगर अध्यक्ष संजू वर्मा सृष्टि रोड अपने आवास वार्ड नंबर 6 पर कही ।हमारे भारतीय समाज और संस्कृति में जहां स्त्री को देवी का स्वरूप माना जाता है।

वहां क्यों वास्तविक स्थिति इसके विपरीत नजर आती है?

क्यों एक स्त्री को आज भी एक पैर की जूती के समान समझा जाता है?

आंतरिक या बाहरी तौर पर इस हिंसा के अनेक रूप हैं!

क्यों एक स्त्री को कमजोर या निर्बल होने का एहसास करवाया जाता है?

पुरुष प्रधान समाज अपना पौरुष दिखाते समय शायद यह भूल जाता है कि उसे इस दुनिया में लाने वाली भी एक स्त्री ही है।

एक बेटी को ही उसकी मां संस्कारों का पाठ पढ़ाती है।

पर बेटों को सभ्य इंसान बनने के लिए प्रेरित क्यों नहीं किया जाता?

बेटियों को जितनी हिदायत दी जाती है, उतनी बेटों को दी जाए, तो समस्या ही पैदा न हो।

कहने को बेटा- बेटी एक समान कहा जाता है, लेकिन परवरिश में इतना अंतर क्यों होता है?

एक स्त्री आज भी वर्षों पुरानी कुरीतियों, यौन शोषण, बलात्कार, छेड़छाड़ आदि की शिकार है।

इसी तरह की हिंसा की शिकार महिलाएं अंदर ही अंदर घुटती रहती है!

महिलाओं की सुरक्षा के लिए सरकार बड़े-बड़े दावे करती है लेकिन वास्तविक सुरक्षा एक स्त्री के अंदर ही है

जरूरत है उसे पहचानने की अपने अस्तित्व को जानने की, अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होने की,

हिंसा के प्रति डट कर आवाज उठाने की और खुद आगे आने की।