बिना अच्छी राजनीतिक संस्कृति के सुशासन दे पाना क्या संभव?

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🔹जिम्मेदार कौन? मतदाता या राजनीतिक दल?

✒️संजय वर्मा-गोरखपूर,चौरा चौरी(प्रतिनिधी)मो:-9235885830

गोरखपूर(दि.20ऑक्टोबर):-उक्त बातें चौरी चौरा मुंडेरा बाजार सृष्टि रोड वार्ड नंबर 6 के वरिष्ठ समाजसेवी संजू वर्मा ने अपने आवास पर कही।मौके के साथी बनकर टिकट लेकर चुनाव जीत लेना और फिर दलबदल कर सत्ता का सुख लेना क्या परंपरा बन गई हैं!बिहार विधानसभा चुनाव में जिस तरह दूसरे दलों से आए नेताओं को प्रत्याशी बनाया जा रहा है,वह बस नजीर भर है!दरअसल पिछले कुछ वर्षों से राजनीति में धनबल, बाहुबल का महत्त्व तेजी से बढ़ा है!

आम कार्यकर्ता जिन्होंने बरसों तक पार्टी की नीतियों और कार्यक्रमों को जनता तक पहुंचाने का काम किया, उनकी उपेक्षा की जाती है! हद तो तब हो जाती है जब ठीक चुनाव के समय नौकरी से जुड़े लोगों को भी पार्टी के टिकट दे दिए जाते हैं। तर्क दिया जाता है कि सामाजिक समीकरण इनके अनुकूल है और यही सीट जीत पाने में सक्षम हैं,चुनाव बाद ऐसे ही लोग दल बदल करते हैं तो हाय-तौबा मचने लगती हैं!

विचारधारा का राजनीतिक दलों से अब कोई वास्ता ही नहीं रहा।इस तरह राजनीतिक अप-संस्कृति जो पनपी है, उसके लिए जिम्मेदार कौन है? मतदाता या राजनीतिक दल?
लेकिन जो बातें साफ हैं, उससे लोकतंत्र का भला होने वाला नहीं है, क्योंकि राजनीतिक दल ही लोकतंत्र के वाहक होते हैं। वही स्वस्थ जनमत तैयार करने में मदद करते हैं।

चुनाव जीतने के बाद शासन की बागडोर इनके हाथों में होती है। ऐसे में सोचने वाली बात यह है कि बिना अच्छी राजनीतिक संस्कृति के सुशासन दे पाना क्या संभव है? आखिर इस तरह की दलीय व्यवस्था सुधारने की जिम्मेवारी किसकी है?इस तरह के सवालों के लिए सबसे मुफीद समय चुनाव ही है।