परिवार के लोगों को घर की महिलाओं का सम्मान और जरूरतों को पूरा करना चाहिए

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🔹विचार का संपर्क ही असली सशक्तिकरण होता।

✒️संजय वर्मा-गोरखपूर,चौरा चौरी(प्रतिनिधी)मो:-9235885830

गोरखपुर(दि.5नोव्हेंबर):-उक्त बातें चौरी चौरा मुंडेरा बाजार सृष्टि रोड वार्ड नंबर 6 से समाजसेवी संजू वर्मा ने अपने आवास पर कही I
देश की आधी आबादी बिना रोजगार के जीवन-यापन कर रही और घर में रह रही महिलाओं के रोजगार के बारे में जिक्र आता है तो उनके कॉलम में गृहिणी लिखा जाता है। इसका अर्थ यह लगाया जाता है कि वे घर में बैठी रहती हैं कोई काम नहीं करती हैं। खाना पीना बनाती हैं, बच्चे का देखभाल करती हैं। उनके द्वारा किए जा रहे समस्त कार्यों का मूल्यांकन सही तरीके से नहीं किया जाता है।

जबकि नजरिया बदल कर देखा जाए तो वे घर के बाहर जाकर नौकरी नहीं भी कर रही हों तो परिवार को संभाले रखने के एक बहुत ही मजबूत आधार स्तंभ के रूप में वे खड़ी रहती हैं। काम करती हैं। घर की साफ-सफाई के साथ-साथ स्वस्थ ताजा खाना-पीना बनाना, परिवार की देखभाल करने जैसे महत्त्वपूर्ण कार्य वे करती हैं। बच्चों की पढ़ाई के खातिर वे अपने शौक को तिलांजलि दे देती हैं।

इन सबों का बाजार भाव के मुताबिक मूल्य आंका जाए तो जो महिलाएं या पुरुष बाहर जाकर कुछ कमा कर लाते हैं, उनसे कहीं अधिक मूल्य का काम वे करती हैं। लेकिन उन्हें पुरुषों के बराबर सम्मान नहीं मिलता। घर में बैठी महिलाओं के कामकाज का भी आकलन शून्य की दृष्टि से कतई नहीं किया जाना चाहिए और इस संदर्भ में परिवार के लोगों को तो घर की महिलाओं का सम्मान और जरूरतों को पूरा करना ही चाहिए।

इनके साथ साथ सरकारी स्तर पर गृहिणी के रूप में घर-परिवार जैसी महत्त्वपूर्ण संस्था का निर्वाह कर रही महिलाओं के लिए कुछ न कुछ न्यूनतम मेहनताना देने का व्यवस्था जरूर करनी चाहिए, क्योंकि आर्थिक युग में आर्थिक नजरिए से वह बहुत ही महत्त्वपूर्ण अर्थ को संभालने के बावजूद उनके हाथ में शून्य ही आता है।

महिलाओं के लिए भी यह जरूरी है कि वे घरों की दहलीज में सिमटे रहने के बजाय बाहर की दुनिया चुनें, घूमने के लिए और काम करने के लिए भी। विचार का संपर्क ही असली सशक्तिकरण होता है और विचार बाहर की दुनिया में ही विचरण करता है।