बहोत ही मनोहारी : सन्त समागम निरंकारी

    33

    (54वाँ महाराष्ट्र वर्चुअल निरंकारी सन्त समागम – मुम्बई.)

    ज्ञान एक जानकारी है, जिसके उजाले में ब्रह्मज्ञानी ब्रह्म और माया को, सत्य और झूठ को साफ साफ देख सकता है। यह ज्ञान बहुत महान है, लेकिन इसका लाभ तभी है जब हम इस जानकारी को जीवन में अपनाएँ, मिथ्या माया को छोड़कर सत्य ब्रह्म के साथ जुड़ें। ऐसी अस्सल बाते निरंकारी बाबा हरदेव सिंह जी महाराज बताते थे। ज्ञान के बावजूद अगर कोई माया में ही लिप्त रहता है, झूठ का सहारा लेता है तो उसे भी अवश्य नुकसान उठाना पड़ेगा। इसमें ज्ञान का कोई दोष नहीं। अगर रोशनी होते हुए भी कोई आँखें बंद कर ले तो उसे ठोकरें तो लगेंगी ही। अगर हमें ठोकरों से बचना है तो हमें अपनी आँखें खुली रखनी होंगी, ज्ञान के प्रकाश में सब कुछ देखते हुए अपना रास्ता निश्चित करना होगा। रास्ते की रुकावटों को देखकर उनसे बचकर निकलना होगा, तभी हम आगे बढ़ पाएँगे और इस ज्ञान का, भक्ति का आनंद ले पाएँगे। सन्तकवि एकनाथ जी बताते हैं –

    “एका जनार्दनी अनुभवावांचुनी।कोरडी ते कहाणी ब्रह्मज्ञान ।।” [सन्त एकनाथांची अभंग गाथा : अभंग क्र.2624.]

    परमात्मा की भक्ति के लिए ब्रह्मज्ञान की प्रथमत: जरूरी है। भक्ति शब्द भज धातु से बना है। इसका अर्थ सेवा करना है। भज भजन अर्थात् आराधना के अर्थ में भी है। सद्गुरू या भगवान के प्रति उत्कट प्रेम ही भक्ति है। जब भक्त सेवा या आराधना के द्वारा भगवान से साक्षात संबंध स्थापित कर लेता है तो इसे ही गीता में भक्तियोग कहा गया है। निरंकार परमात्मा की सर्वोच्च अभिलाषा ही भक्ति है। भक्त भक्ति रंग में ही रंग जाता हैं। वह प्रेम में इतना मदमस्त हो जाता है कि उसे प्रभु के अलावा कुछ दिखाई ही नहीं देता है। मनुष्य जब तक किसी ध्येय या वस्तु के प्रति श्रद्धानिष्ठ नहीं होगा तब तक सफल नहीं हो सकता। यही बात गीता के परम शुभ तत्त्व आत्मसिद्धि, आत्मलाभ या आत्मसाक्षात्कार के विषय में भी लागू होती है।

    इसी प्रकार जब तक हम ईश्वर के प्रति श्रद्धावान नहीं होंगे तब तक उसमें हमारी निष्ठा नहीं हो सकती। परमपिता की भक्ति भी उस के प्रति श्रद्धा या आस्था से ही हो सकती है। यह भी कहा जा सकता है कि श्रद्धा साधन है तो भक्ति साध्य है। तात्पर्य यह है कि जो लोग गुणों से पूर्णतया शुद्ध हो चुके हैं और दिव्य ज्ञान को प्राप्त करते हैं, वे ही भगवद्भक्ति आरम्भ कर सकते हैं तथा सर्वसिद्धि प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन जो ब्रह्मज्ञान के बिना यज्ञ, दान, तप आदि करते हैं वह बेकार हैं और इस जन्म तथा अगले जन्म दोनों को ही व्यर्थ गवाँ बैठते हैं। ग्रन्थकार सन्तश्रेष्ठ अवतार सिंह जी महाराज भक्ति के बारे में बताते हैं –

    “भक्ति लोकीं अजे न समझे रब नूं पाणा भक्ति ए। छड के सारे वहम भुलेखे गुरु रिझाना भक्ति ए। इक नूं मनणा इक नूं तक ना इक नूं पाणा भक्ति ए। बाकी सारे कर्म छोड़ एह कर्म कमाना भक्ति ए। बेरंगा ए बेरूपा ए बाणी जो फ़रमाया ए। कहे अवतार मैं हू-ब-हू ही रमे राम नूं पाया ए।” [सम्पूर्ण अवतार बाणी : पद संख्या – 301.]

    भगवान के प्रति उसका अनुराग इतना तीव्रतम होता है कि उसे यत्र-तत्र-सर्वत्र भगवान ही नजर आते हैं। भक्ति से भक्त अपने आपको परमात्मा में विलीन कर लेता है। परमात्मा के सिवा उसे कुछ भी दिखाई नहीं देता है। गीता में स्वयं भगवान कहते हैं- मैं न तो योगियों के हृदय में वास करता हूं और न ही स्वर्ग में रहता हूं अपितु मैं वहीं रहता हूं जहां मेरे भक्त मेरा गुणगान करते हैं। ज्ञानी भक्त भक्तियोग को ही श्रेष्ठ मानते हैं। उनके अनुसार गीता का उपक्रम और उपसंहार अर्थात् आदि और अन्त दोनों ही भक्ति योग है। गीता का एकमात्र श्रेष्ठ मार्ग भक्ति योग ही है। अत: गीता का मुख्य तात्पर्य भक्त का सद्गुरू की शरण में चले जाना है। सन्त जनाबाईने कहा हैं – “नवल वर्तले नवल वर्तले नवल गुरूचे पायी। कापूर जळुनि गेला तेथे काजळी उरली नाही।।”

    जैसे भक्त के लिए सबसे प्रिय सद्गुरू अर्थात भगवान होते हैं, वह सर्वात्मना उसी का ध्यान एवं पूजा करता है वैसे ही भगवान के लिए भक्त भी प्रिय होता है। जो द्वेष नहीं करता, सभी जीवों का दयालु मित्र है, जो अपने को स्वामी नहीं मानता और मिथ्या अहंकार से मुक्त है, जो सुख-दु:ख में समभाव रहता है, सहिष्णु है, सदैव आत्मतुष्ट रहता है, आत्मसंयमी है वही भक्त भगवान के लिए अत्यन्त प्रिय है। सद्गुरू को भजन, अर्चना, उपासना, ध्यान आदि के माध्यम से खुश करना ही भगवान की भक्ति है। भक्त भगवान के सगुण रूप में ही अनुरक्त रहता है, निर्गुण रूप में नहीं। वह साकार ईश्वर की उपासना करता है, निराकार की नहीं। भगवान असीम तथा भक्त सीमित है। जब भक्त अपना सब कुछ सद्गुरू के प्रति अर्पित कर देता है तो वह अपूर्ण का पूर्ण के प्रति अथवा ससीम का असीम के प्रति समर्पण कहलाता है। भक्ति योग का तात्पर्य है अनन्यता, परमपिता परमात्मा के अतिरिक्त किसी दूसरे का भाव मन में न लाना ही अनन्य भाव कहलाता है। कहा गया है कि अनन्य भाव से ही परमात्मा की प्राप्ति होती है। सन्तशिरोमणि हरदेव सिंह जी महाराज कह रहे हैं –

    “प्रभु को अर्पण होने वाला कभी न दुख से घबराये। प्रभु सहारे जीवन पथ पर नित आगे बढ़ता जाये। प्रभु को अर्पण होने वाला रहता नही उदास हैं। जो भी होगा अच्छा होगा उसको ये विश्वास हैं।” [सम्पूर्ण हरदेव बाणी : पद संख्या – 248.]

    आप जी सभी प्यारे भाई-बहन, महाराष्ट्र का 54 वाँ वार्षिक निरंकरी सन्त समागम का ऑनलाइन प्रसारण 26, 27 और 28 फरवरी 2021 देख कर आनन्द उठा सकते है। यह प्रसारण प्रतिदिन शाम 5.00 बजे से रात्रि 9.00 बजे तक मिशन की वेबसाइट संस्कार टिवी चैनल पर एक साथ होगा। आप जी महसूस करेंगे की, जिस परमात्मा निरंकार के अन्तर्गत सर्वभूत मात्र है और जिस सच्चिदानन्द धन परमात्मा से यह समस्त जगत परिपूर्ण है, वह सनातन, अव्यक्त परमपुरूष, पुरुषोत्तम, निराकार ईश्वर, प्रभु परमात्मा तो ज्ञानोत्तर अनन्य भक्ति से ही प्राप्त होने योग्य है।
    !! बडे़ प्यार से कहना जी, धन निरंकार जी !!

    ✒️चरणरज -श्रीकृष्णदास (बापु) निरंकारी.[मराठी-हिन्दी साहित्यिक]मु.- प. पू. गुरुदेव हरदेव कृपानिवास,
    रामनगर वॉर्ड नं.20, गढ़चिरोली.जीला – गढ़चिरोली (नागपुर विदर्भ, महाराष्ट्र)मोबा. 9423714883.
    इमेल – Krishnadas.nirankari@gmail.com